उमानंद मंन्दिर, गुवाहाटी

मंदिर का नामकरण

उमा का अर्थ है मां यानी पार्वती और आनंद भगवान शिव का ही नाम है। वहां के लोग ऐसे भी मानते हैं की जब भगवान शिव यहां ध्यान कर रहे थे तब माता पार्वती नीलांचल पहाड़ी पर उनकी प्रतीक्षा कर रही थी इसलिए इस मंदिर का नाम पर गया उमानंद, कहा यह भी जाता है की भगवान शिव ने देवी उमा के अपने आनंदमई समय को व्यतीत करने के लिए इस दीप को उत्पन्न किया था। इस मंदिर से नीलांचल पहाड़ भी दिखाई देती है जहां मां कामाख्या देवी का मंदिर है। तीर्थयात्री कामाख्या मंदिर जाने से पहले यहा जरूर आती है विघ्न डालने के कारण कामदेव को भगवान शिव द्वारा जहा भस्म किया गया था, वह जगह भी उमानंद द्वीप ही है। इसलिए नदी द्वीप का नाम भस्माचल द्वीप है, और इस द्वीप को Peacock Island भी कहते हैं।

 

उमानंद मंदिर का इतिहास

इतिहासकारों का माने तो उमानंद मंदिर अहोम राजा गदाधर सिंह साम्राज्य में फूकन गढ़गन्य हंदीक्यू द्वारा 1694 में बनाया विशेष वास्तुशिल्प नक्काशीयुक्त शिव मंदिर है। आश्चर्यजनक बात यह है की बाढ़ के या बारिश के सीजन में भी उमानंद मंदिर के भीतर अब तक कभी भी पानी अंदर नहीं गई। वर्ष 1807 के भूकंप ने इस मंदिर को क्षति पहुंचाई थी जिसे बाद में एक स्थानीय वैष्णव व्यापारी ने ठीक करवाया था।
पुराने समय में ब्रह्मपुत्र इस पहाड़ी के उत्तर की ओर से बहता था दाहिनी और एक सौदागर रहता था जिसके पास बहुत सारे जानवर थे उन्हीं जानवरों में से एक कामधेनु भैंस हमेशा दूध देने के लिए इस पहाड़ पर चली आती थी जब सौदागर ने उसका पीछा किया तब देखा कि वह एक बेल के पेड़ के नीचे दूध देती है सौदागर ने उस स्थान की खुदाई की तो वहां शिवलिंग दिखाई दिया उसी रात सौदागर के सपने में भगवान शिव ने दर्शन दिया और वहां मंदिर बनाने का आदेश दिया लेकिन उसी रात भारी भूकंप से ब्रह्मापुत्र का बहाव दो भागों में बढ़ गया और वो पहाड़ ब्रह्मपुत्र के बीचो बीच एक टापू की शक्ल में रह गया जो उमानंद दीप कहलाता है। उसके बाद उस सौदागर ने उस टापू में मंदिर का निर्माण करवाया।
इस दीप से जुड़े एक इतिहास यह भी है जिसका वर्णन शिव पुराण में भी मिलता है ब्रह्मपुत्र नदी के बीचों-बीच जिस दिन पर उमानंद मंदिर का निर्माण किया गया है, उस पहाड़ को भस्मांचल भी कहते हैं। कालिका पुराण में इसका वर्णन किया गया है कि सृष्टि के आरंभ में जब भगवान शिव इस पहाड़ी पर ध्यान कर रहे थे तब कामदेव ने उनका ध्यान बाधित किया था,शिव क्रोध में आ गया और उन्होंने अपनी तीसरी आंख खोलकर कामदेव को जलाकर भस्म कर दिया। इसीलिए इस पहाड़ी का नाम भस्मांचल पड़ा।

 

Umananda Temple
Umananda Temple

धर्म,आस्था और परम्परा

Assam की प्राचीन महाभारत कालीन नाम प्रगज्योतिषपुर है। असम की राजधानी (दिसपुर) Guwahati है। दोस्तों आप लोग शायद गुवाहाटी का मतलब जानना चाहते हैं तो चलिए” गुवा यानी सुपारी” और “हाटी यानी बाजार”। मतलब सुपारी का बाजार। कामरूप के पुराने लोग कहते हैं की असम की दिसपुर मैं सुपारी का बहुत बड़ा बाजार लगता था इसीलिए इस जगह का नाम पड़ा गुवाहाटी। ऐसे तो साल भर में यहां भक्तों का आना जाना लगा रहता है। यहां हर साल फरवरी के महीने में पढ़ने वाली शिवरात्रि के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। जहां पैर फैलाने के लिए भी जगह नहीं होती, मंदिर तो अपने आप में बहुत ही खूबसूरत है पर मंदिर के चारों और बहने वाले ब्रह्मापुत्र का नजारा मंत्रमुग्ध कर देने वाले होते हैं। इस दीप पर पांच और मंदिर है- गणेश मंदिर, हरगौरी मंदिर, जयंतीका मंदिर, चंद्रशेखर मंदिर और वैद्यनाथ मंदिर। उमानंद निवासियों के लिए महाशिवरात्रि सबसे पवित्र दिन होता है स्थानीय राज्य में उमानंद दीप के ब्राह्मणों की जड़ें, उत्तर प्रदेश के कन्नौज इलाके में है। इसका मतलब है कि उमानंद दीप के ब्राह्मण, मूलत: कान्यकुब्ज हैं। मंदिर की दीवार पर की गई ढेरों नक्शा काफी रोचक है हिंदू धर्म के भगवान सूर्य, शिव, गणेश और देवी सहित कईयों की सभी दीवारों पर आका गया है। इस मंदिर की एक और विशेषता है कि यहां साल भर शाकाहारी भोग लगाए जाते हैं लेकिन शिवरात्रि के दिन मांसाहारी भोग लगाता हैं। कहा जाता है की जब यह मंदिर बनवाया गया था तब असम में कोई ब्राम्हण परिवार निवास नहीं करता था, इसीलिए उत्तर प्रदेश के कन्नोज लोग इस मंदिर की देखरेख करते थे और आज भी उत्तर प्रदेश के कन्नोज परिवार के लोग देखरेख कर रहे हैं। मंदिर का नियम था कि पहाड़ पर किसी भी पुजारी का परिवार नहीं रहेगा और आज भी इस नियम का पालन किया जाता है आज भी इस मंदिर में कुल 16 पुजारी है और सभी के परिवार यहां से 20 किलोमीटर दूर “चांन्गसारी” में रहता है।
शिवरात्रि के दिन पार्वती की तरह पत्नी और शिव की तरह पति पाने की तमन्ना के लिए काफी युवक, युवतियां यहां पर शिव की आराधना करने आते हैं। शिवरात्रि के दिन उमानंद में खास चार प्रकार की पूजा का विधान है। जो लोग यहां श्रद्धा से पूजा करते हैं उन लोगो की हर मनोकामना भोले बाबा और मां पार्वती पूरी करती है।

 

उमानंद द्वीप का आकर्षण

तीर्थ यात्रियों के लिए उमानंद दीप का सबसे प्रमुख आकर्षण उमानंद मंदिर है, यहां के सबसे सुंदर प्राकृतिक परिवेश और देखने लायक यहां के मंदिर पेड़ पौधे आदि। दुनिया के दुर्लभ सुनहरी लंगूर है 17 विशेष किस्म के पक्षी है समय आने पर प्रवासी पक्षियों का वास है। उमानंद द्वीप पर मौजूद सुनहरी लंगूर सिर्फ पश्चिम असम के कुछ हिस्से तथा भूटान की काली पहाड़ियों के तलहटी क्षेत्र में ही पाए जाते हैं लोग यह भी कहते हैं कि 2 नौजवान यहां इन लंगूर का एक जोड़ा छोड़ गए थे उसके बाद सुनहरा लंगूरों की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई थी उसके बाद यह अब करीब गिने-चुने ही लंगूर होंगे आपको देखने के लिए उमानंद द्वीप पर। ब्रह्मापुत्र नदी पर से जितना शान्त दिखता है अतस्थल में वह उतना ही बेचैन रहता है।
इस दीप पर पांच और मंदिर है- गणेश मंदिर, हरगौरी मंदिर, जयंतीका मंदिर, चंद्रशेखर मंदिर और वैद्यनाथ मंदिर। अगर आप यह मंदिर घूमने जा रहे हैं तो शाम के समय जाइए, जब सूरज ढल रहा हो। क्योंकि उस समय उस स्थान या द्वीप बहुत ही मनमोहक और खूबसूरत लगती है।

 

मंदिर में कैसे जाए

यह मंदिर असम की राजधानी (दिसपुर) गुवाहाटी में है। गुवाहाटी के कामरूप उपायुक्त कार्यालय या कि कचहरी घाट के सामने स्थित है उमानंद नदी द्वीप। यह द्वीप ब्रह्मापुत्र नदी के बीचों-बीच है। द्वीप पर जाने के लिए आपको नाव,मोटर बोट या स्ट्रीमर से जाना पड़ेगा। घाटी से द्वीप तक पहुंचने के लिए आपको 15 से 20 मिनट तक यात्रा तय करना होगा ब्रह्मापुत्र नदी के किनारे स्थित किसी भी घाट से नौकाएं आसानी से मिल जाती है। सुबह 7:00 बजे से लेकर शाम 5:00 बजे तक मंदिर खुला रहता है।

 

 

Google Map Location :-

https://goo.gl/maps/fBNzaiLfY6DEhjnj7

 

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