मुगल काल के कुछ इतिहास | Some History 0f Mughal Period

बू-हलीमा का बाग़ की इतिहास :-

 

वास्तुकला की दृष्टि से यह निष्कर्ष निकाला गया है कि अहाते की दीवारें और उसके दरवाजे मुगल काल के प्रारंभ से संबंधित अथवा 16 वी शताब्दी से संबंधित है ऐसा संभव है कि मकबरे की वजह से बगीचे का निर्माण करवाया गया होगा क्योंकि यहां पर मकबरा बगीचे के बीच में स्थित नहीं है। यह विश्वास किया जाता है कि बगीचे के उत्तरी कोने में स्थित ढांचा बू- हलीमा का मकबरा है। हुमायूं के मकबरे का मुख्य पश्चिमी दरवाजा पहले एक आयताकार अहाते मैं खुलता है। जिसके उत्तर में एक मकबरा है और उसके पूर्व में एक दरवाजा है। यह बू- हलीमा का बाग है। बू- हलीमा के बारे में और उनके नाम, के पीछे इस बगीचे का नाम पढ़ने के बारे में कोई जानकारी नहीं है किंतु यह अज्ञात महिला इस मकबरे मैं यहां पर दफनाए गई थी।

अनगढ़े ठोस बलुआ पत्थर से बनाई गई दिवारे, बगीचे का पूर्वी दरवाजा साधारण गोलाकार है, इसके दरवाजे मेहराबदार है और उन्हें कमानीदार ताकों से अलंकृत किया गया है। किसी समय इसकी बाहर-सतह चमकदार रंगीन टाइलों से पूरी तरह सुसज्जित थी इसके कुछ चिह्न अभी भी विद्यमान है।

 

15 वीं शताब्दी का नीला गुम्बद की इतिहास :-

 

नीला गुम्बद स्मारक मुगल काल की सबसे पुरानी संरचना में से एक है और इसे 1530 में बनाया गया था। नीला गुम्बद स्मारक को यमुना नदी मैं एक द्वीप पर बनाया गया था और बाद में 1569-70 मैं जब हुमायूं के मकबरे का निर्माण किया गया तो इसे और आसपास की अन्य संरचनाओं को परिसर में शामिल कर लिया गया था।नीला गुम्बद, हुमायूं के मकबरे के अहाते के दक्षिण पूर्व की ओर और निजामुद्दीन रेलवे स्टेशन के उत्तर में स्थित है। नीला गुम्बद को गुंबद में लगे नीले रंग की टाइल्स के कारण यह नाम दिया गया था । ये स्मारक मुगल काल की सबसे पुरानी संरचनाओं में से एक है। नीला गुम्बद किस व्यक्ति का है इसकी पहचान के बारे में इतिहासकार अभी तक जानने में असमर्थ है।

 

लेकिन कुछ इतिहासकारों का विश्वास है कि नीला गुंबद में अब्दुर्रहीम खां खान-ए-खानां के एक सेवक फहीम खां का शा रखा हुआ है क्योंकि अब्दुर्रहीम खां खान-ए-खानां का मकबरा भी उसके साथ ही है। इस मत के अनुसार इस मकबरे का निर्माण 1625 में किया गया था। बाहर से दिखाई देने पर यह मकबरा असमान अष्ट कोनिया आकार का है इसके 8 अग्रभागों मी चार-उत्तर, दक्षिण-पूर्व और पश्चिम की ओर है जिन पर आला नुमा बंद दरवाजो जैसे मेहराब बनाए गए हैं। अंदर से मकबरा वर्ग कार है जबकि इसकी छत को रंगदार और उत्कीण पलस्तर से सजाया गया है। मकबरे पर लगे टाइल्स के ऊपर एक उल्टा कमल बनाया गया है। जिसके ऊपर लाल बलुआ पत्थर का कंगूरा लगा है। इसका गुंबद एक चबूतरे पर बना है। और जिसे नीले और पीले रंग की टाइलों से सजाया गया था।

वर्ष 2017 मैं UNESCO ने हुमायूं के मकबरे को विस्तारित विरासत स्थल के हिस्से के तहत नीला गुंबद को भी विश्व धरोहर (World heritage site) घोषित क्या था

 

 

सब्ज़ बुर्ज़ का इतिहास :-

 

 

16 वीं शताब्दी के अंत या 17 वी शताब्दी के आरंभ में बनाए गये इस अष्टभुजाकार मकबरे का मध्य एशियाई स्वरूप साफ-साफ दिखाई देता है। सब्ज़ बुर्ज़ एक चबूतरे पर स्थित है और इसके चार चौडे़ तथा 4 संकरे पाशव है। इसके सभी पाशव मैं ताकों मैं बने ऊंचे मेहराब है। और रंगीन टाइलों से ढकी एक ऊंचा गुंबद है। इन टाइलों के कारण इसका नाम “सब्ज़ बुर्ज़ “पडा़। लेकिन अभी स्मारक की मरम्मत के प्रयास में अधिकतर प्रारंभिक हरी टाइलों को नीली टाइलों में बदल दिया गया है। दरवाजे की खुली जगहों के ऊपर मेहराबों पर आरंभिक लाल रंग अभी भी है और भीतरी कक्षा में एक अज्ञात व्यक्ति की कब्र है।

इसे मुगल काल के आरंभ का स्मारक कहा जा सकता है। सब्ज़ बुर्ज़ मथुरा रोड और लोदी रोड के चौराहे पर स्थित है, जो कि दिल्ली का एक सीमाचिहन है। और ये शहर के सुंदर स्मारकों में से एक है। कहा यह भी जाता है की इस स्मारक को कई वर्षों तक, अंग्रेजों ने पुलिस स्टेशन भी बनाया था। तो दोस्तों यही था “सब्ज़ बुर्ज़” की इतिहास कि कहानी।

 

लाल गुम्बद का इतिहास :-

 

13 बीं शताब्दी के आसपास बना यह मकबरा शोक कबीर उद्दीन औलिया का है जो सूफी संत शोक रोशन चिराग ए देहली के शिष्य थे जिनका दरगाह लाल गुंबद के पूर्व में 1 किलोमीटर की दूरी पर चिराग दिल्ली गांव में स्थित है। चिराग देहली ने ही शोक निजामुद्दीन औलिया के बाद चिशितया धर्म गुरु के रूप में स्थान ग्रहण किया था। यह तुगलक काल की इमारत, मालवीय नगर की और जाने वाली सड़क पर पंचशील पार्क के दक्षिण में स्थित है।

 

इस इमारत के ऊपर एक शंक्वाकार गुंबद है, जो कि अष्टभुजा कार सतह पर आधारित है। एक मिली ऊंचे चबूतरे पर निर्मित यह मकबरा एक चौकोर कक्ष है। जिस की दीवारें लाल बलुआ पत्थर से बनाई गई है। यह मकबरा यस उद्दीन तुगलक के मकबरे को याद दिलाता है। एक जमाने में इस पर सोने का कलश चढ़ा हुआ था जिसे चुरा लिया गया चोरों ने दीवारों पर चढ़ने के लिए इसकी पश्चिम दीवार पर लगे लोहे के छल्लो का इस्तेमाल किया। और इस तरह से इसका नाम “रकाबवाला” गुंबद पड़ा। यही था “लाल गुम्बद ” की इतिहास कि कहानी।

 


 

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