Durga Puja और Navaratri हिंदू धर्म का एक बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार है

Durga Puja, Navratri का महत्व

हिंदू धर्म (Hindu Dharam) का बहुत ही महत्वपूर्ण त्यौहार है दुर्गा पूजा (Durga Puja) धार्मिक,आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और सांसारिक महत्व है। दुर्गा पूजा, नवदुर्गा और नवरात्रि कहें, प्रतिवर्ष हिंदुओ द्वारा मनाए जाने वाली एक प्रसिद्ध त्यौहार है। नवरात्र का वास्तविक अर्थ- देवी और राक्षस के बीच युद्ध के 9 दिन और 9 रात से है। ऐसे तो यह पूजा पूरे भारत और विदेश में भी होता है। लेकिन खासकर यह दुर्गा उत्सव बहुत धूमधाम से पश्चिम बंगाल (WestBangal) और नॉर्थ ईस्ट ( NorthEast) की राज्य में मनाए जाते हैं। जैसे- असम, बिहार, झारखंड, मणिपुर, ओडिशा और त्रिपुरा। इसे शारदीय पूजा, शरद उत्सव, पतझर का उत्सव, मायेर पूजा,और भगवती पूजा उत्सव भी कहते हैं। यह भव्य त्योहार (Festivals) मां दुर्गा द्वारा महिषासुर के अंत की खुशी में मनाए जाते हैं। इस पर्व को बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। वहीं, कुछ लोगों का मानना है कि साल के इन्हीं 9 दिनों में देवी मां अपने मायके आती है ऐसे में इन 9 दिनों को दुर्गा उत्सव के रूप में मनाए जाते हैं। जिसे नवरात्रि ( Navaratri ) भी कहते हैं। इस दौरान श्रद्धालु देवी के नौ रूपों की आराधना कर उनसे आशीर्वाद मांगते हैं।
कुछ लोगों का मानना है कि दुर्गा पूजा खासकर बंगाली हिंदू समाज के लोगों द्वारा पहले शुरू हुई, इस पूजा की ख्याति पश्चिम बंगाल और असम में धीरे-धीरे बढ़ी है और आसपास के हिंदू बहुल राज्य में भी इस पूजा की करने लगे हैं।

 

दुर्गा पूजा और नवरात्रि कब होता है ?

यह त्यौहार Hindu Calendar के अनुसार नवरात्रि शरद ऋतु में अश्विन शुक्ल पक्ष से शुरू होती हैं और पूरे 9-10 दिनों तक चलती है, परंतु मां दुर्गा की मूर्ति को कहीं-कहीं पे सातवें दिन से पूजा की जाती है। ये त्यौहार साल के September और October के महीने में आता है।

 

दुर्गा मूर्ति का वर्णन-

दुर्गा देवी की मूर्ति छोटे-बड़े मिट्टी से बनाया और सजाया जाता है जो देखने में बहुत ही सुंदर दिखती है। मां दुर्गा को शक्ति की देवी कहा जाता है। देवी दुर्गा के मूर्ति के 10 हाथ होते हैं और उनका वाहन सिंह होता है। असुर Demon मतलब महिषासुर के विनाश के लिए दुर्गा मां 10 प्रकार के अस्त्र रखती है जो सभी भगवान द्वारा उन्हें वरदान में मिला था। लक्ष्मी और सरस्वती मां उनके दोनों और विराजमान रहते हैं जो उन्हीं के रूप हैं, लक्ष्मी मां- धन,समृद्धि और सरस्वती मां- शिक्षा,ज्ञान की देवी है। उन्हीं के पास में भगवान कार्तिके और गणेश की मूर्तियां भी स्थापित की जाती है। आखरी दिन मतलब “दशहरा” दुर्गा पूजा समापन के बाद मिट्टी की मूर्तियों को समुद्र, तालाब या नदियों में विसर्जित कर दिया जाता है।

 

दुर्गा पूजा से जुड़ी कई कथाएं-

 

ऐसा माना जाता है कि मां दुर्गा ने इस दिन महिषासुर नामक असुर का संहार किया था जो भगवान ब्रह्मा का वरदान पाकर काफी शक्तिशाली हो गया था ब्रह्मा जी ने महिषासुर को यह वरदान दिया था कि कोई भी देवता या दानव उस पर विजय प्राप्त नहीं कर सकता बरदान पाकर वह स्वर्ग लोक में देवताओं को परेशान करने लगा और पृथ्वी पर भी आतंक मचाने लगा उसने स्वर्ग में एक बार अचानक आक्रमण कर दिया और इंद्र को परास्त कर स्वर्ग पर कब्जा कर लिया था सभी देवता परेशान होकर “त्रिमूर्ति” ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास सहायता के लिए पहुंचे सारे देवताओं ने मिलकर उसे परास्त करने के लिए एक युद्ध किया परंतु वह हार गए कोई उपाय ना मिलने पर देवताओं ने उसके विनाश के लिए “देवी दुर्गा” का सृजन किया जिसे शक्ति और पार्वती के नाम से भी जाना जाता है देवी दुर्गा ने महिषासुर पर आक्रमण कर उससे 9 दिनों तक युद्ध किया और दसवे दिन उसका वध किया इसी उपलक्ष में हिंदू लोग दुर्गा पूजा का त्यौहार मनाते हैं और दसवे दिन को दुर्गा मूर्ति को विसर्जन कर “विजयादशमी” करते हैं।

 

Durga Puja Pandel,Barpeta Road

दुर्गा देवी का वर्णन और अलग-अलग नाम-

इस त्यौहार में अलग राज्य/ जगह में देवी दुर्गा के 9 रूपो कि पूजा की जाती है। अलग-अलग जगहों में मां देवी की अलग-अलग नामों से भी पूजा किया जाता है। वेदों (Vedas) में तो दुर्गा का व्यापक उल्लेख है, किंतु उपनिषद (Upanishads) में देवी “उमा हैमवती” (हिमालय की पुत्री) का वर्णन है। पुराणों में दुर्गा को आदिशक्ति माना गया है, दुर्गा असल में शिव की पत्नी आदिशक्ति का एक रूप है। उस आदिशक्ति देवी ने ही सावित्री (ब्रह्मा जी की पहली पत्नी) लक्ष्मी, और पार्वती (सती) के रूप में जन्म लिया और उसने ब्रह्मा, विष्णु और महेश से विवाह किया था। तीन रूप होकर भी दुर्गा (आदिशक्ति) एक ही है। देवी दुर्गा के स्वयं कई रूप हैं। जैसे सावित्री लक्ष्मी और पार्वती। मुख्य रूप उनका गौरी है, अर्थात शान्तमय, सुंदर और गोरा रूप। उनका सबसे भयानक रूप काली है अर्थात काला रूप। विभिन्न रूपों, विभिन्न नाम और विभिन्न स्थानों में देवी दुर्गा को पूजा किया जाता है।

दुर्गा सप्तशती के अनुसार इनके अन्य स्वरुप भी है, जैसे-

1. ब्राह्मणी
2. महेश्वरी
3. कौमारी
4. वैष्णवी
5. वाराही
6. नरसिंही
7. ऐन्द्री
8. शिवदूती
9. भीमादेवी
10. भ्रामरी
11. शाकम्भरी
12. आदिशक्ति
13. रक्तदंतिका
14. उग्रचंडी

 

दुर्गा पूजा का आकर्षण-

श्रद्धालु पूरे 9 दिनों तक व्रत रखते हैं और पूजा करते हैं। पहले दिन कलश स्थापन की जाती है और फिर अष्टमी या नवमी के दिन कुंवारी पूजा और कन्याओं को भोजन करवाया जाते हैं। वहीं पश्चिम बंगाल में आखिरी 4 दिन यानी कि छठी से लेकर दसवीं दिन तक यह दुर्गा उत्सव मनाए जाते हैं। इन 9-10 दिन मैं जो चाहल पहल और रौनक देशभर में दिखाई देती है वह माहौल मन को बहुत सुकून देती है। इन सब में सबसे ज्यादा आकर्षक और खूबसूरत परंपरा जहां नजर आती है वह राज्य है पश्चिम बंगाल की दुर्गा पूजा और वहां पर देश विदेश से भी पर्यटक पूजा का आनंद लेने जाते हैं। हर तरफ देखते हैं भव्य पंडाल, पूजा की पवित्रता, रंगों की छटा, तेजस्वी चेहरे वाले देवियां, सिंदूर खेला जो दशहरे के दिन होता है धुनुची नृत्य और भी बहुत कुछ ऐसा जो शब्द में बयां नहीं किया जा सकता है। पूजा के दौरान पंडाल और मूर्ति सबसे आकर्षण का केंद्र रहते हैं सिर्फ भारत ही नहीं दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भी देवी मां के भव्य पंडाल और मूर्ति स्थापित किया जाता है। लोग अपने परिवार रिश्तेदार और दोस्तों के साथ एक पंडाल से दूसरे पंडाल जाते हैं और देवी मां की मूर्ति भी दर्शन करते हैं। जहां खाने-पीने की बात आती है तो आप लोगों को पंडालों से बहुत सारे स्वादिष्ट देवी की प्रसाद जैसे- खिचड़ी (Khichdi), रसगुल्ला (Rasgulla), बर्फी, मालपुआ, पूरी, संदेश, लड्डू (Laddu), पलाओ, पनीर (Paneer) से बने भाजि और तरह-तरह के व्यंजन मिल जाएंगे। पंडालों के आसपास मेले भी लगते हैं जिनमें खाने-पीने से लेकर बहुत सारे अलग-अलग तरह की दुकान में भी लगते हैं।

 

धुनुची नृत्य:-(Danuci Dance) 

एक खास तरह के बर्तन को धुनुची कहा जाता है जिसमें सूखे नारियल के छिलके को जलाकर दुर्गा मां की आरती की जाती है आरती के दौरान धुनुची के साथ भक्त झूम कर नाचते हैं और कई तरह के नित्य भी करते हैं।

 

ढाक:- (Dhak)

दुर्गा मां की आरती के समय यह ढाक बजाया जाता है। ढाक एक तरह का ढोल है।

 

सिंदूर खेला:- (Sindur Khela)

विजयादशमी यानी नवरात्रि के दसवें दिन पंडालों में महिलाएं मां दुर्गा की पूजा करने के बाद उन्हें सिंदूर चढ़ाया जाता है। इसके बाद महिलाएं एक-दूसरे को सिंदूर लगाती है। इसी परंपरा को सिंदूर खेला (Sindur Khela) कहा जाता है। इस खेल का मान्यता है कि मां दुर्गा की मांग भर कर उन्हें मायके से ससुराल विदा किया था।

विसर्जन:- (Bishorjan)

नवरात्रि (Navratri) के आखिरी दिन जिसे दशहरा(Dusshera) या विजयदशमी (Vijayadashami) कहते हैं। सिंदूर खेल के बाद दुर्गा मां की प्रतिमा को विसर्जन के लिए ले जाया जाता हैं। उस समय लोग नाचते गाते हुए मां की प्रतिमा को पास के नदी,समुंदर या तालाबों मैं विसर्जित करते हैं।

 


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